Teachers recommend Class 7 Social Science Notes in Hindi and Class 7 SST Chapter 6 Notes in Hindi पुनर्गठन का काल for mastering important definitions and key concepts.
The Age of Reorganisation Class 7 Notes in Hindi
पुनर्गठन का काल Class 7 Notes
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 नोट्स पुनर्गठन का काल
→ प्रस्तावना
मौर्य काल के 200 ई.पू. से 300 ई. तक के युग में समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक राज्यों का उद्य हुआ। प्राचीन काल में विंध्य पर्वतमाला और नर्मदा नदी के दक्षिण का प्रदेश ‘दक्षिणापथ’ के नाम से जाना जाता था, वर्तमान में ‘दक्कन’ कहते हैं। दक्कन के दक्षिण में द्रविड़ परिवार की भापाएँ बोलने वाले लोगों का क्षेत्र है। महापापाणी (मेगार्लीथिक) स्थलों की खुदाई से जानकारी मिलती है वे लोग लौहकर्म से परिचित थे।
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जब मौर्यों ने प्रायद्धीप के कुछ भागों को जीत लिया था, उस समय वहाँ विशिष्ट संस्कृति पहले से मौजूद थी। मौर्यों के पतन के बाद ये क्षेत्र स्वतंत्र हो गए। नए राजा प्रायः उन्हीं परिवारों के थे जिन्होंने मौर्यों की सेवा की थी। इस काल में पूर्ववर्ती क्षेत्रों का पुनर्गठन कर नवीन राज्यों का निर्माण हुआ, इसलिए कुछ विद्वानों ने इसे ‘पुनर्गठन’ का काल कहा है। इस अध्याय में हम मौर्योत्तर काल के पुनर्गठन, सम्राटों के द्वारा अपनाए गए मूल्यों और सिद्धांतों और विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में उनके योगदान का अध्ययन करेंगे।

→ मौर्य साम्राज्य का अंत
- मौर्य साम्राज्य का अंतिम शासक ‘वृहद्रथ’ था। इसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में कर दी और मगध पर शुंग वंश की नींव डाली।
- मौर्य वंश के पतन का मुख्य कारण अशोक के उत्तराधिकारियों का दुर्बल होना और साम्राज्य के प्रदेशों की अत्यधिक दूरी थी, जिससे प्रशासन में और सम्पर्क स्थापित करने में कठिनाई होती थी।
- पूर्वी भारत, मध्य भारत और दक्कन में मौर्यों के स्थान पर अनेक स्थानीय शासक सत्ता में आए।
- पश्चिमोत्तर भारत में मौर्यों के स्थान पर मध्य एशिया से आए अनेक राजवंशों ने अपनी सत्ता स्थापित की। इसमें ‘कुषाण’ सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए।
- शुंग वंश (187-75 ई.पू.) का उदय।
- शुंग वंश का संस्थापक ‘पुष्यमित्र शुंग’ था, जिसने सफल विद्रोह के द्वारा अंतिम मौर्य शासक ‘वृहद्रथ’ की हत्याकर इस वंश की स्थापना की। बाण भट्ट की ‘हर्षचरित’ में इस घटना का उल्लेख मिलता है।
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→ शुंग इतिहास के स्रोत
| साहित्य | अभिलेख | सिक्के |
| 1. गार्गी संहिता 2. महाभाष्य 3. दिव्यावदान 4. मालविकाग्निमित्र 5. हर्षचरित |
1. अयोध्या 2. विदिशा (भिलसा) |
1. कौशाम्बी 2. अयोध्या 3. अहिच्छत्र 4. मधुरा |

1. भरहुत स्तूप बेदिकाएँ:
2. वेदिका पर उत्कीर्ण लक्ष्मी की आकृति;
3. गायकों और नर्तकों की मंडली:
4. धर्म-चक्र को उठाए हुए हाथी।

1. ग्रीक योद्धा को दर्शाता स्तंभ
2. पुरुष आकृति
3. छोटे बालक को गोद में लिए हुए स्त्री:
4. पंखे के साथ स्त्री
5. गमला
6. बालों के आभूषण के साथ पकी मिट्टी से बनी स्त्री की आकृति
7. राजपरिवार;
8. काँसे की चूड़ियाँ जिन पर सोने की पतली परत चढ़ी हुई है
9. हाथी दाँत से बना कंघा
10. हार के मनके
- धनदेव का ‘अयोध्या अभिलेख’ पुष्यमित्र द्वारा दो अश्वमेध यज्ञ करवाने की जानकारी देता है।
- शुंग काल में ‘संस्कृत भाषा’ का पुनरुत्थान हुआ।
- इस काल में ही पंतजलि ने ‘योग सूत्र’ की रचना की।
- पुष्पमित्र शुंग ने लगभग 36 वर्ष तक शासन किया।
- पुष्यमित्र शुंग के पश्चात् उसका पुत्र ‘अग्निमित्र’ शासक बना।
- शुंग वंश, बाह्मण जाति से सम्बन्धित होने के कारण, इसके साम्राज्य को ‘बाह्मण साम्राज्य’ के नाम से भी जाना जाता है।
- ‘भरहुत का स्तूप’ जिसमें अत्यंत सुंदर वेदिकाएँ और महात्मा बुद्ध के जीवन की कथाओं को दर्शाया गया है, इस काल की साहित्य, वास्तुकला और कला का अद्वितीय उदाहरण है।
- अंतिम शुंग शासक ‘दंवभुति’ था, जिसकी हत्या उसके मंत्री ‘वसुदंव’ के द्वारा की गई।
- ‘वसुदेव’ के द्वारा ही 75 ई.पू. में शुंग वंश के अन्तिम शासक ‘देवभूति’ की हत्या करके ‘कण्व-वंश’ की स्थापना की गई।
- कण्व वंश में चार शासक हुए, जिनमें वसुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मन थे।
- कण्व वंश ने 75 ई.पू. से 30 ई.पू. तक शासन किया।
- 30 ई.पू. में सुशर्मन की सातवाहन शासक ‘सिमुक’ के द्वारा हत्या कर इस वंश का अन्त किया गया।
- सातवाहन वंश-‘सिमुक’ ने सातवाहन वंश की स्थापना की।
- ‘दक्कन’ और मध्य भाग में मौर्यों के उत्तराधिकारी ‘सातवाहन’ कहलाए। सातवाहनों को ‘आन्ध्र’ के नाम से भी जाना जाता था।
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→ सातवाहन शासक के प्रमुख शासक
(i) सिमुक -60-37 ई.पू.
(ii) कृष्ण – 37-27 ई.पू.
(iii) शातकर्णी प्रथम -27-17 ई.पू.
(iv) गौतमीपुत्र शातकर्णी – 106-130 ई.
(v) वशिष्ठीपुत्र पुलमावी -130-154 ई.
(vi) यजश्री शातकर्णी – 165-194 ई.
– सातवाहन साम्राज्य मुख्यतः वर्तमान आंध्रप्रदेश, तेलगाना तथा महाराष्ट्र तक फैला था।
– भिन्न-भिन्न समयों पर सातवाहनों की राजधानी अनेक स्थानों पर रही, जिसमें ‘अमरावती’ और ‘प्रतिष्ठान’ (पैठन) प्रसिद्ध थी।
– इस राजवंश के सिक्के गुजरात से लेकर आंध्रप्रदेश तक मिले हैं।

- समुद्री व्यापार तत्कालीन आर्थिक जीवन का मुख्य अंग था, सिक्कों पर भी समुद्री जहाज की आकृतियाँ पाई गई हैं।
- सातवाहनों की भाषा प्राकृत और लिपि ब्राह्मी थी।

- सातवाहनों का समाज मातृसत्तात्मक था। राजकुमारों के नाम भी माताओं के नाम पर रखे जाते थे जैसे-गौतमीपुत्र शात्तकर्णी।
- सातवाहन वासुदेव (कृष्ण) के उपासक थे। साध ही साथ उन्होंने वैदिक विद्वानों. जैन मुनियों और बौद्ध भिधुओं को कर-मुक्त कृषि भूमि प्रदान की।
- कार्ल गुफाएँ व पीतलखोंरा गुफाएँ (महाराप्द्र) बनाने में सातवाहनों ने अपना योगदान द्विया।

- तीसरी शताब्दी में सातवाहन साम्राज्य छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में विख्डाडित हो गया।
→ चेवियों का आगमनः
- मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद चेदि वंश के अधीन कलिंग एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा।
- खाखेल इस वंश के प्रमुख राजा थे जो जैन धर्म के अनुयायी थे। उन्हें ‘भिश्वु-राजा’ भी कहा जाता हैं।
- भुवनेश्वर के पास स्थित उद्यगिरि-ख्रंडिगिर गुफाएँ-चित्रपटों, प्रतिमाओं और पत्थरों को काटकर बनाई गई हैं, जो शैलकृत्व स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।

- उदर्यगिरि की एक प्रमुख गुफा में हाधीगुंफा अभिलेख उत्कीण है, जा ग्राही लिपि में लिखा गया है, इस वंश के राजा खारवेल के सैन्य अभियानों, जनकल्याण के कार्यो को प्रदर्शित करता है।

→ दक्षिण में साम्राज्य और जन-जीवन:
- भारत के दक्षिणी भाग में दूसरी या तीसरी शताब्दी सा०सं०पू. से लेकर तीसरी शताब्दी सा०स०० तक का कालख्रंड तीन महान शक्तिशाली राजवंशों के उत्कर्ष का काल रहा-चेर, चोल एवं पांड्य।
- ये वंश आपसी प्रतिद्वंद्विता के साथ-साथ व्यापार एवं संस्कृति की उन्नति में योगदान देते रहे।
- उस काल में अनेक कवियों की रचनाएँ ‘संगम साहित्य’ में संगृहीत थी, जिसके कारण इस युग को ‘संगम युग’ कहा जाता है।

- संगम शब्द संस्कृत के ‘संघ’ से बना है, जिसका अर्थ ‘समिति’ या एकत्र होना होता है। संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य है।
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→ चोल वंशः
- संगम साहित्य में वर्णित-चोल, चेर और ‘पांड्य में ‘चोल राजवंश’ सबसे शक्तिशाली राजवंश था।
- चोल नरेश करिकाल ने चेर और पांड्य की संयुक्त सेना को पराजित किया था।
- राजा करिकाल ने ‘कल्लनई’ या ‘ग्रैंड एनीकट’ प्रसिद्ध परियोजना की शुरुआत की। यह एक संश्लिष्ट जल-वितरण प्रणाली है।

- इस जल-वितरण प्रणाली से कावेरी नदी के जल को केंद्रीय एवं दक्षिण कावेरी डेल्टा क्षेत्रों की ओर मोड़ा गया, इससे यह क्षेत्र ‘दक्षिण का अन्न भण्डार’ कहलाया।
- चोलों के वैभव का मुख्य स्रोत ‘सूती कपड़े’ का व्यापार था।
- चोल राजवंश का राजकीय चिन्ह ‘बाघ’ था।
→ चेर राजवंशः
- संगमकालीन राज्यों में चेर राज्य को सबसे प्राचीन माना जाता है।
- अशोक के वृहद शिलालेख में चेरों का उल्लेख केरलपुत्र’ के रूप में हुआ है।
- इन्होंने तमिलनाडु और केरल के पश्चिमी भागों पर शासन किया।
- चेर शासकों का रोमन साम्राज्य और पश्चिम एशिया के साथ विस्तृत व्यापारिक सम्बन्ध थे। मसाले, लकड़ी, हाथी दाँत प्रमुख निर्यातक थे।
- चेरों की राजधानी ‘वंजि’ थी, जो वर्तमान तमिलनाडु का करुर नगर है।
- चेर साम्राज्य के सिक्के पर चेर राजवंश का राजचिह्न पाए गए हैं।

→ पांड्य वंशः
- पांड्य राज्य का सर्वप्रथम वर्णन ‘मेगस्थनीज’ ने किया।
- पांड्य राज्य भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित था।
- इनकी राजधानी वर्तमान में ‘मदुरै’ में थी।
- पांइय राज्य का ग्रीस एवं रोम जैसी दूरस्थ शक्तियों से व्यापारिक सम्बन्ध था। यह राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था।
- पांड्य वंश भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख नौसैनिक शक्ति थी।
- पांड्य राजाओं ने कला, वास्तुकला और संपूर्ण क्षेत्र की समृद्धि में विशेष योगदान दिया।
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→ इंडो-ग्रीक आक्रमण:
- सिकंदर (एलेक्जेंडर) के सिंधु मैदानों से वापसी के बाद क्षत्रपों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए, जिन्हें इंडो-ग्रीक के रूप में जाना गया।
- मौर्य वंश के बाद, उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्र) इंडो-ग्रीक आक्रमण के लिए सुगम क्षेत्र बन गए।
- इससे समृद्ध स्थानीय संस्कृति के प्रभाव में आने से शासन, कला, भाषा और दैनिक जीवन में ग्रीक और भारतीय संस्कृति का मिश्रण हुआ।
- हलियोंडोरस स्तंभ, विदिशा (मध्य प्रदेश) ऐसे सम्बन्धों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।

- अभिलेखों में वासुदेव की स्तुति ‘देवताओं के देवता’ के रूप में हुई है।
- एक अभिलेख में तीन अमर उपदेश (पदचिह्न) आत्म-संयम, दान, चेतना को बताया गया है, जिससे स्वर्ग प्राप्ति संभव है।
- उत्तर भारत में खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को इंडो-ग्रीक सिक्के मिले हैं, जो सोने, चाँदी, ताँबे और गिलट धातु के बने थे।
- इन सिक्कों पर एक ओर राजा और दूसरी ओर ग्रीक देवता व कुछ सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी जैसे भारतीय देवी-देवता अंकित मिले हैं।

→ कुषाणों का उदय:
- कुषाण मूलतः मध्य एशिया के निवासी थे।
- कुषाणों का साम्राज्य मध्य एशिया से लंकर उत्तर भारत के विशाल भूभाग तक फैला था।
- कनिष्क इस वंश के सबसे शक्तिशाली राजा थे।
- कनिष्क की 1.85 मी० ऊँची सिरविहीन मूर्ति प्राप्त हुई है, जिस पर ब्राह्मी लिपि में ‘महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क अंकित है।

- कुषाणों ने रेशम मार्ग (सिल्क रूट) के महत्वपूर्ण भागों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था।

- कुषाणों के समय, धार्मिक कला का विकास हुआ. जिसने उपमहाद्वीप में मंदिर वास्तुकला का विकास किया।
- गांधार और मधुरा कला शैली द्वारा दर्शाई गई कुषाण कला और वास्तुकला भारतीय और ग्रीक शैलियों के सम्मिश्रण के लिए प्रसिद्ध है।
- गांधार शैली मुख्यतः पंजाब के पश्चिमी भागों में विकसित हुई। इसमें ग्रीक-रोमन एवं भारतीय तत्वों का समायोजन दिखाई देता है।

- मधुरा कला शैली, वर्तमान उत्तर प्रदेश के मधुरा क्षेत्र में विकसित हुई। इस शैली में मूर्तियों के लिए मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ था।
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→ मथुरा और गांधार कला शैली में अंतर
| मथुरा कला शैली | गांधार कला शैली |
| (i) इस कला पर पूर्णतः भारतीय प्रभाव था। | (i) इस कला पर यूनानी-रोमन कला का प्रभाव था। |
| (ii) इस कला में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ था। | (ii) इस कला में स्लेटी-काले शिस्ट पत्थर का प्रयोग हुआ था। |
| (iii) मथुरा कला बौद्ध, हिन्दू और जैन धर्मों से प्रभावित थी। | (iii) गांधार कला शैली मुख्य रूप से बौद्ध धर्म से प्रभावित थी। |
| (iv) मथुरा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में विकसित हुई। | (iv) गांधार क्षेत्र (उत्तर पश्चिम भारत और अफगानिस्तान) में विकसित हुई। |
→ इस काल में संस्कृत साहित्य का भी उत्कर्ष हुआ और महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों का संकलन हुआ।

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